आह्वान – भारतीय गौरव और धरोहर को पुनर्जीवित करने का
करें भारतीय संस्कृति के मूल को संरक्षित - संध्योपासना और पंचमहायज्ञ
लेखकः आचार्य (डॉ.) हरिश्चन्द्र और रौनक महेश्वरी
डॉ. हरिश्चन्द्र (बी.टेक., आईआईटी कानपुर; पीएच.डी., प्रिंसटन, अमेरिका) एक वैज्ञानिक और वैदिक विद्वान हैं। उनका विस्तृत परिचय नोट में दिया गया है।1
“इतिहास हमें यह सिखाता है कि सभ्यताएँ केवल बाहरी संस्कृति को संरक्षित करके जीवित नहीं रहतीं, बल्कि वे अपने अंतर्निहित दार्शनिक और तात्त्विक दृष्टिकोण को बनाए रखकर टिकती हैं।”
संध्योपासना व पञ्चमहायज्ञ सभ्यतागत ढाँचे का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसके माध्यम से वैदिक ज्ञान ने पीढ़ियों तक दैनिक जीवन का मार्गदर्शन किया। इसी के कारण भारतीय सभ्यता में आंतरिक स्पष्टता, नैतिक उत्तरदायित्व और सामाजिक सामंजस्य बना रहा।
इनका संरक्षण किसी अप्रासंगिक अतीत को बचाने का प्रयास नहीं है, बल्कि एक गहन आवश्यकता की प्रतिक्रिया है। यह उन अभ्यासों को पुनर्स्थापित करने का प्रयास है, जिन्होंने पीढ़ियों तक नैतिक जीवन, करुणा और सजग कर्मशीलता को पोषित किया।”
भूमिका : भारत की समन्वित जीवन-दृष्टि
मानव इतिहास में भारतीय सभ्यता की एक विशेष पहचान रही है। यहाँ आंतरिक विकास, नैतिक आचरण और दैनिक उत्तरदायित्व को जीवन से अलग-अलग नहीं माना गया, अपितु इन्हें एक समन्वित जीवन-पद्धति के रूप में जिया गया।
वैदिक परंपरा में अध्यात्म को सांसारिक कर्तव्यों से पृथक नहीं रखा गया। ध्यान, मनन, संयम और उत्तरदायित्व को दैनिक जीवन के केंद्र में स्थापित किया गया। इसी समन्वित दृष्टि के कारण भारतीय सभ्यता दीर्घ काल तक स्वयं को बनाए रख सकी। परिस्थितियाँ बदलीं, युग बदले, पर आंतरिक दिशा बनी रही। इस निरंतरता के मूल में वेद हैं, जिनकी जीवन-दृष्टि व्यापक, गहन और अत्यंत व्यवहारिक है।
जीवन का संतुलित उद्देश्य : धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष
वैदिक दृष्टि मनुष्य के जीवन को आध्यात्मिक और भौतिक खंडों में विभाजित नहीं करती।
जीवन को चार परस्पर संबद्ध उद्देश्यों के संतुलित साधन के रूप में देखा गया है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। अर्थ का संबंध साधनों के उत्तरदायित्वपूर्ण उपार्जन और उपयोग से है। काम जीवन के स्वाभाविक और संयमित आनंद को इंगित करता है। मोक्ष आंतरिक स्वतंत्रता और दुःख से मुक्ति का संकेत है।
इनमें से किसी को न तो त्याज्य माना गया और न ही एक-दूसरे के विरुद्ध रखा गया। इन सभी का मार्गदर्शन धर्म करता है, जो संतुलन और नैतिक दिशा प्रदान करता है।
नियमों से आगे : आंतरिक वृत्ति का निर्माण
वैदिक अर्थ में धर्म कोई कठोर नियम-पुस्तिका नहीं है। वह परिस्थिति-सापेक्ष है और मनुष्य की भावना तथा चेतना से गहराई से जुड़ा है। वह भय, लोभ, अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा और प्रभुत्व की वृत्ति को नियंत्रित करता है, साथ ही मानवीय आकांक्षा और सृजनशीलता को विकसित होने का अवसर देता है।
ऋषियों ने यह भी स्वीकार किया कि गृहस्थ जीवन में प्रत्येक कर्म से पूर्व धर्म का बौद्धिक मूल्यांकन करना संभव नहीं है। प्रायः हमारे अधिकांश निर्णय आदतों, भावनात्मक प्रवृत्तियों और संस्कारों से संचालित होते हैं, सतत नैतिक विचार से नहीं ।
साथ ही यह भी स्पष्ट था कि केवल नियमों के अंधानुकरण से नैतिक जीवन संभव नहीं होता। संदर्भ से कटे हुए नियम मनुष्य की स्वाभाविक स्वतंत्रता को बाँध देते हैं, उसकी सृजनात्मक शक्ति को कुंठित कर देते हैं और सामाजिक सामंजस्य को भी दुर्बल बना देते हैं।
इस द्वंद्व का वैदिक समाधान न तो निरंतर तर्क-विचार था और न ही कठोर नियंत्रण। समाधान था आंतरिक वृत्ति का निर्माण। जब चेतना भीतर से परिष्कृत होती है, तब सही आचरण स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है, संकट व दबाव की घड़ी में भी।
संध्योपासनाः दैनिक जीवन में ध्यान
संध्योपासना एक सरल किंतु सुविचारित दैनिक ध्यान पद्धति है, जो योगियों और गृहस्थों दोनों के लिए बनाई गई।
इसी समझ से संध्योपासना का उद्भव हुआ। यह एक सरल किंतु सुविचारित दैनिक ध्यान पद्धति है, जो योगियों और गृहस्थों दोनों के लिए बनाई गई।
संध्या का अर्थ है संधि, अर्थात परिवर्तन का क्षण, जैसे सूर्योदय और सूर्यास्त। इसे सम् और ध्यान के रूप में भी समझा गया है, अर्थात सम्यक रूप से (अच्छे से) किया गया ध्यान। उपासना शब्द उप और आसन से बना है। उप का अर्थ है समीप और आसन का अर्थ है बैठना। इस प्रकार संध्योपासना का तात्पर्य है सुस्थापित ध्यान जिसमें सजगता और श्रद्धा के साथ ईश्वर के समीप आंतरिक रूप से स्थित होना होता है, जिसमें संधि काल का समय उत्तम है।
यह समीपता न तो शारीरिक है और न ही मानसिक या भावात्मक। यह एक ऐसी संस्कारित आंतरिक स्थिति है, जो सामान्य मानसिक चेष्टाओं से परे होती है।
प्राचीन ऋषि, जो योग-साधना में निपुण थे, यह भलीभाँति जानते थे कि उच्चतर स्पष्टता तभी उत्पन्न होती है, जब आत्मा मन के साथ अपनी निरंतर तादात्म्य-भावना को शिथिल कर देती है।
सांख्य दर्शन में ऋषि कपिल ने समाधि और सुषुप्ति, अर्थात् गहरी नींद, के बीच एक सूक्ष्म साम्य की ओर संकेत किया है। दोनों ही अवस्थाओं में आत्मा सक्रिय मन से पृथक हो जाती है। अंतर केवल इतना है कि समाधि में आत्मा सजग रहती है, जबकि सुषुप्ति में सजगता का अभाव होता है।
उपासना का लक्ष्य इसी सजग स्थैर्य की ओर ले जाना है, जहाँ बिना किसी मानसिक तनाव के बोध और अंतर्दृष्टि स्वाभाविक रूप से प्रकट होती है।
ऋषियों को यह भी स्पष्ट था कि ईश्वर सर्वव्यापक है और किसी एक स्थान में सीमित नहीं है। जब आत्मा मन की चंचल वृत्तियों से विरक्त होती है, तब वह स्वभावतः ईश्वर के सान्निध्य में आ जाती है, क्योंकि जब मन का व्यापार नहीं है, तब सर्वव्यापक ईश्वर ही बचता है। । इस आंतरिक गमन को सहारा देने के लिए संध्योपासना में वेद-विहित मंत्रों का प्रयोग किया गया, जिनमें गायत्री मंत्र का विशेष स्थान है। चूँकि ईश्वर इंद्रियों द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता, इसलिए मंत्र-जप एक सेतु का कार्य करता है।
मंत्रोच्चार की लय श्वास और ध्यान को स्थिर करती है, और उसके पश्चात् का शांत आसन मन को दैनिक उलझनों से मुक्त कर स्थिरता की ओर ले जाता है। और हम बहुत सहजता से ध्यान लगा पाते हैं। इस प्रक्रिया में ईश्वर कोई कल्पित सत्ता नहीं रह जाता, बल्कि एक स्नेहपूर्ण और मार्गदर्शक उपस्थिति के रूप में अनुभूत होने लगता है।
अभ्यास, रूपरेखा और सुलभता
अक्सर संध्योपासना के महत्व को पूरी तरह समझा नहीं जाता और इसे अन्य भक्ति-क्रियाओं से बदल दिया जाता है। इसलिए यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि संध्योपासना किसी एक मंत्र के कारण अद्वितीय नहीं है। इसका विशेष महत्व इसकी रूपरेखा, अनुक्रम और आंतरिक उद्देश्य में निहित है, जो पीढ़ियों से वेदीय ज्ञान को संरक्षित करता आया है।
इसका अनुक्रम धीरे-धीरे प्रकट होता है, जैसे फूल खिलता है। इसके अभ्यास में मूल अंग जैसे आचमन, प्राणायाम और संकल्प का प्रयोग किया जाता है, ताकि आंतरिक संसार को शुद्ध और स्थिर किया जा सके, और फिर ध्यान की शांति में प्रवेश किया जा सके। संध्या के प्रत्येक चरण का विशेष उद्देश्य है: जैसे की अहंकार को शिथिल करना, स्वाभाविक नकारात्मकता को मुक्त करना, और नम्रता, कृतज्ञता और नैतिक स्पष्टता को पुनः स्थापित करना। शत्रुत्व और प्रतिक्रियाशीलता को उनके मूल स्रोत पर शांत करके, संध्योपासना जीवन दृष्टि और आचरण को नया रूप देती है। इस प्रकार जीवन में सहभागिता भय, द्वेष या बाध्यता से नहीं, बल्कि संतुलन और विवेक से उत्पन्न होती है।
यह दैनिक आंतरिक समन्वय धर्म की स्थापना में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
संध्योपासना इस प्रकार तैयार की गई है कि सीमित समय वाले व्यक्ति भी इसका लाभ उठा सकें। इसके लिए व्यापक अध्ययन या जीवन से दूर होने की आवश्यकता नहीं है। बच्चे सरल मंत्र-जप से शुरुआत कर सकते हैं, सुनने और दोहराने के माध्यम से सीखते हैं। समय के साथ, जैसे-जैसे समझ विकसित होती है, अभ्यास अपने आप गहराई में प्रवेश करता है। इस प्रकार आंतरिक अनुशासन, श्रद्धा और नैतिक संवेदनशीलता केवल निर्देश से नहीं, बल्कि अनुभव से आत्मसात होने लगती है।
यह दैनिक आंतरिक समन्वय धर्म की स्थापना में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भय को शमित करने, प्रतिक्रियाशीलता को कम करने और संसाधनों के उपभोग की अत्यधिक इच्छा को शांत करने से संध्योपासना नैतिक स्पष्टता को स्वाभाविक रूप से उत्पन्न करती है। सुबह का अभ्यास मन को क्रियाशीलता के लिए तैयार करता है, जबकि शाम का अभ्यास विश्राम और चिंतन की सुविधा देता है। समय के साथ नैतिक जीवन आंतरिक दृष्टिकोण बदल जाने के कारण बाहरी प्रयास से नहीं, बल्कि स्वभाव से प्रकट होने लगता है।
पंचमहायज्ञ से संबंध
जीवन को सुंदर व संस्कारित करने में संध्योपासना पूर्ण रूप से सक्षम होते हुए भी अकेली नहीं है। यह पंचमहायज्ञ की व्यापक वैदिक संरचना में प्रथम यज्ञ ब्रह्मयज्ञ का हृदय है। पंचमहायज्ञ गृहस्थ के पांच दैनिक उत्तरदायित्वों का प्रतीक है। इनमें ज्ञान और विवेक की देखभाल, प्रकृति और पारिस्थितिक संतुलन की जिम्मेदारी, पूर्वजों और परिवार की परंपरा का सम्मान, समाज और मानव साथियों के प्रति कर्तव्य, तथा समस्त जीवों के प्रति दायित्व शामिल हैं। इन सभी से सुनिश्चित होता है कि व्यक्तिगत जीवन व्यापक आपसी सहयोग की भावना से जुड़े रहे।
संध्योपासना से उत्पन्न आंतरिक स्पष्टता गृहस्थ को इन सभी दायित्वों को संतुलन और निष्ठा से निभाने में सक्षम बनाती है।
नैतिक जागरूकता केवल व्यक्तिगत नहीं रहती, बल्कि यह स्वाभाविक रूप से सामाजिक व्यवहार और पारिस्थितिक देखभाल में विस्तृत हो जाती है। इस दृष्टि से संध्योपासना भारत की सांस्कृतिक मूल्यों की आत्मा है, जबकि पंचमहायज्ञ उसकी सभ्यता की संरचना और आधार है।
इतिहास हमें यह सिखाता है कि सभ्यताएँ केवल बाहरी संस्कृति को संरक्षित करके जीवित नहीं रहतीं, बल्कि वे अपने अंतर्निहित दार्शनिक और तात्त्विक दृष्टिकोण को बनाए रखकर टिकती हैं।
भाषा, पर्व, कला और स्मारक तब भी अस्तित्व में रह सकते हैं जब आंतरिक दिशा बदल चुकी हो। जब मूल दृष्टिकोण परिवर्तित होता है, तो सभ्यता परिचित रूपों को रखते हुए भी मौलिक रूप से बदल सकती है। संध्योपासना और पंचमहायज्ञ इसी आधारभूत स्तर पर कार्य करते हैं। वे केवल रीति-रिवाजों का संरक्षण नहीं करते, बल्कि उस आंतरिक दृष्टिकोण को बनाए रखते हैं जो संस्कृति को वास्तविक अर्थ देता है।
संरक्षण का प्रश्न : आंतरिक दिशा और सांस्कृतिक निरंतरता
आज जीवन को उन्नति की दिशा देने वाले नित्य कर्म, संध्योपासना व ध्यान आदि स्वाभाविक रूप से दैनिक जीवन का अंग नहीं रहे। इसका कारण उनकी अप्रासंगिकता नहीं, बल्कि इनके अर्थ और प्रासंगिकता के प्रति जागरूकता में गिरावट के कारण है।
आधुनिक ध्यान तकनीकें, जो प्राचीन उपासना के लिए किए जाने वाले ध्यान प्रणालियों की सरलीकृत रूप हैं, वैज्ञानिक परीक्षणों में मानसिक स्पष्टता, रचनात्मकता और भावनात्मक संतुलन में मापनीय लाभ दिखा चुकी हैं। इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि संध्योपासना में और भी गहन संभावनाएँ हैं, क्योंकि इसे उपासना के लिए पूर्ण नैतिक और दार्शनिक ढांचे में ऋषियों द्वारा निर्मित किया गया था।
भजन, भक्ति गीत या सामान्य जप अपने संदर्भ में मूल्यवान हैं, ये विभिन्न भक्ति-क्रियाएँ भावनात्मक पोषण करती हैं, पर संध्योपासना का स्थान नहीं ले सकतीं। संध्योपासना में ईश्वर को किसी रूप, कथा या व्यक्तित्व के माध्यम से नहीं देखा जाता, बल्कि उसे सर्वव्यापी वास्तविकता और उस नैतिक क्रम के रूप में देखा जाता है जो स्वयं अस्तित्व के आधार में निहित है।
इससे वेदों की दार्शनिक स्पष्टता बनी रहती है और आध्यात्मिक जीवन कल्पना, पसंद या संप्रदायिक व्याख्या पर निर्भर नहीं होता।
समान रूप से यह भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि संध्योपासना सीधे उस मूल ध्यान-क्षण तक ले जाती है, जिस पर ऋषियों ने विशेष बल दिया है। यह क्षण आत्मा का सक्रिय मन से शांत विच्छेद है। जैसा कि समाधि और सुषुप्ति की समानता के माध्यम से समझाया गया है, लक्ष्य न तो तीव्र भावावेग है और न ही मानसिक सक्रियता की वृद्धि, बल्कि चेतना सहित गहन आंतरिक स्थिरता है।
जप और अन्य भक्ति-प्रथाएँ मन को शांत कर सकती हैं अथवा भावनात्मक रूप से ऊँचा उठा सकती हैं, पर संध्योपासना की संरचना विशेष रूप से इस प्रकार की गई है कि साधक मन से आगे शांत ध्यान की अवस्था में प्रवेश कर सके। इसी कारण मंत्रोच्चार के बाद ध्यान अनिवार्य है, जिससे साधक उस स्थिति में पहुँच सके जहाँ स्पष्टता किसी प्रयास के बिना स्वयं प्रकट होती है।
ध्यान के लिए यह सटीक व सहज गति, जो वैदिक दृष्टि में ईश्वर की समझ पर आधारित है, संध्योपासना को केवल एक प्राचीन अभ्यास की प्रथा नहीं बल्कि एक मौलिक अनुशासन बनाती है, जिसके माध्यम से वैदिक जीवन पद्धति का आंतरिक सार संरक्षित और पीढ़ी दर पीढ़ी संचारित होता है।
भारतीय आध्यात्मिक जीवन में संध्योपासना की केंद्रीय भूमिका शास्त्रों में स्पष्ट रूप से प्रमाणित है। मनुस्मृति में कहा गया है कि संध्या उपासक को वैदिक पुण्य और ज्ञान से जोड़ती है।
एतदक्षरमेतां च जपन् व्याहृतिपूर्विकाम् ।
सन्ध्ययोर्वेदविद्विप्रो वेदपुण्येन युज्यते ॥
रामायण के बालकाण्ड (1.23.2) में महर्षि विश्वामित्र श्रीराम को प्रातःकाल अपनी नित्य संध्या करने का स्मरण कराते हैं। यह संकेत करता है कि संध्या केवल एक कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि जीवन के अनुशासन का आवश्यक अंग थी, जिसे बाल्यकाल से ही आत्मसात किया जाता था।
भगवद्गीता (10.22, 10.26, 10.35) में श्रीकृष्ण स्वयं को प्रतीकात्मक रूप से सामवेद, महर्षि कपिल और गायत्री छन्द के रूप में निरूपित करते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि संध्योपासना में दर्शन, ध्यान और मंत्र का गहन समन्वय निहित है। यह केवल जप या वाचन नहीं, बल्कि वैदिक दृष्टि से ईश्वर-बोध की एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया है।
महाभारत के अनुशासन पर्व (अध्याय 104) में श्रीभीष्म यह शिक्षा देते हैं कि ऋषियों ने दीर्घायु संध्या के नियमित अभ्यास से प्राप्त की।
ऋषयो दीर्घसंध्यत्वाद् दीर्घमायुः समाप्नुयुः।
महर्षि दयानंद सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश में संध्योपासना को ईश्वर के साथ ध्यानात्मक सान्निध्य बताया है, जो योग की समाधि के समान है। वे यह भी कहते हैं कि संध्योपासना के फलस्वरूप धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस प्रकार वह संपूर्ण और संतुलित जीवन तथा संस्कृति का आधार बनती है।
आह्वान: जीवंत अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर का पुनर्जीवन
इस दृष्टि से देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि संध्योपासना और पञ्चमहायज्ञ केवल व्यक्तिगत धार्मिक आचरण नहीं हैं और न ही वे किसी एक समुदाय या काल तक सीमित हैं। वे एक ऐसे सभ्यतागत ढाँचे का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसके माध्यम से वैदिक ज्ञान ने पीढ़ियों तक दैनिक जीवन का मार्गदर्शन किया। इसी के कारण भारतीय सभ्यता में आंतरिक स्पष्टता, नैतिक उत्तरदायित्व और सामाजिक सामंजस्य बना रहा। यही वह जीवंत परंपरा है, जिसने भारतीय सभ्यता को गहराई और निरंतरता प्रदान की।
अतः यह समयोचित ही नहीं, बल्कि अत्यंत आवश्यक है कि संध्योपासना और पञ्चमहायज्ञ को जीवंत अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संरक्षित किया जाए। इसके लिए सरकारी और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा औपचारिक मान्यता आवश्यक है, किंतु उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है इनका समझ, निष्ठा और गौरव के साथ दैनिक जीवन में पुनः अंगीकार किया जाना, न कि केवल औपचारिक कर्तव्य के रूप में।
इनका संरक्षण किसी अप्रासंगिक अतीत को बचाने का प्रयास नहीं है, बल्कि एक गहन आवश्यकता की प्रतिक्रिया है। यह उन अभ्यासों को पुनर्स्थापित करने का प्रयास है, जिन्होंने पीढ़ियों तक नैतिक जीवन, करुणा और सजग कर्मशीलता को पोषित किया।
आज के जटिल और चुनौतीपूर्ण समय में इनका संरक्षण और अभ्यास अनिवार्य हो गया है। संध्योपासना और पञ्चमहायज्ञ आंतरिक स्पष्टता, संतुलित कर्म और सामूहिक कल्याण का एक जीवंत मार्ग प्रदान करते हैं। इन्हें स्मरण करने, सम्मान देने और सचेत रूप से पुनर्जीवित करने का समय यही है, ताकि यह कालातीत ज्ञान आने वाली पीढ़ियों तक व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन का मार्गदर्शन करता रहे।2
सप्रेम,
हरिश्चन्द्र
आचार्य (डॉ.) हरिश्चन्द्र (72 वर्ष) एक अद्वितीय व्यक्तित्व हैं, जिनमें वैज्ञानिक प्रतिभा और गहन आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि का सुंदर सम्मिश्रण है।
🔹 शैक्षणिक उत्कृष्टता: इन्होंने आईआईटी कानपुर से बी.टेक किया और प्रिंस्टन विश्वविद्यालय, अमेरिका से दहन विज्ञान (Combustion Science) में पीएच.डी. प्राप्त की।
🔹 अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक: अमेरिका, जर्मनी, नॉर्वे और भारत में वैज्ञानिक के रूप में कार्य किया।
🔹 आध्यात्मिक समर्पण: सफल वैज्ञानिक करियर के पश्चात् इन्होंने अपने जीवन को आध्यात्मिक और दार्शनिक अध्ययन को समर्पित किया, विशेष रूप से वैदिक अनुसंधान, वेदांत दर्शन और भारतीय परंपराओं पर ध्यान केंद्रित किया।
🔹 प्रतिष्ठित विद्वान: इन्होंने नीदरलैंड्स के Vrije Universiteit Amsterdam में शिक्षण और शोध कार्य किया तथा वैदिक मनोविज्ञान, विज्ञान और योग दर्शन के अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन्होंने अनेकों पुस्तकें और लेख प्रकाशित किए और दर्शन, उपनिषद, वेद, योग, ध्यान, संध्योपासना तथा सांख्य पर अध्यापन किया। इसके साथ ही इन्होंने सांख्य दर्शन का महत्वपूर्ण भाष्य भी किया, जो दर्शन के सिद्धांतों को जीवन में उतारने में सहायता करता है।
🔹 प्रतिष्ठित पुरस्कार: इन्होंने वैदिक दर्शन पर असाधारण कार्य के लिए ‘वेद-रत्न’ पुरस्कार प्राप्त किया।
मूल लेख से अनुवाद - रौनक माहेश्वरी (https://quarkwellbeing.substack.com/p/a-call-to-revive-our-pride-and-heritage)


